Traditional Cultural Messages of the Sanja Festival in the Malwa and Nimar Regions: An Empirical Study
मालवा और निमाड़ क्षेत्र में संजा पर्व के पारंपरिक सांस्कृतिक संदेश: एक अनुभवजन्य अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.31305/rrjiks.2025.v2.n2.003Keywords:
Sanja, Malwa, Nimar, Shraddh Paksha, Cultural Values, Folk TraditionAbstract
This research paper presents an empirical analysis of the traditional cultural messages of the Sanja festival, celebrated during Shraddh Paksha (Pitru Paksha) in the Malwa and Nimar regions. The Sanja festival is mainly observed by adolescent girls, who create figures from cow dung and worship them as a form of the goddess. For sixteen days, unmarried girls craft different patterns from cow dung, with a unique song dedicated to each day. During the Sanja festival in Malwa, Nimar, and parts of Rajasthan, unmarried girls decorate walls with various artworks made of cow dung for sixteen days and adorn them with flowers and leaves. In the present times, the practice of using cow dung is gradually being replaced with paper decorated with flowers and leaves. “Sanja” in the Malwa region is also celebrated through songs and folk music performed by groups of young girls, making it a traditional, melodious, and captivating festival. This tradition symbolizes not only religious devotion but also social morality, women’s empowerment, and cultural preservation. The study is based on statistical analysis (Correlation, ANOVA, Factor Analysis) of data collected from 150 respondents.
Abstract in Hindi Language: यह शोध पत्र मालवा और निमाड़ क्षेत्र में श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) के दौरान मनाए जाने वाले संजा पर्व के पारंपरिक सांस्कृतिक संदेशों का अनुभवजन्य विश्लेषण करता है।संजा पर्व मुख्यतः किशोरियों द्वारा गोबर से आकृतियाँ बनाकर देवी की पूजा के रूप में मनाया जाता है। सोलह ही दिन तक कुंवारी कन्याएँ गोबर के अलग-अलग मांडने मांडती है तथा हर दिन का एक अलग गीत भी होता है।संजा पर्व पर मालवा, निमाड़, राजस्थान के क्षेत्रों में कुंवारी कन्याएं गोबर से दीवार पर 16 दिनों तक विभिन्न कलाकृतियां बनाती हैं तथा उसे फूलों व पत्तियों से श्रृंगारित करती हैं। वर्तमान में संजा का रूप फूल-पत्तियों से कागज में तब्दील होता जा रहा है। “संजा” मालवा क्षेत्र में युवा लड़कियों के समूह द्वारा गाये जाने वाले गीत, लोक संगीत एक पारंपरिक मधुर और लुभावना उत्सव है।यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि सामाजिक नैतिकता, स्त्री सशक्तिकरण, और सांस्कृतिक संरक्षण का भी प्रतीक है।इस अध्ययन में 150 उत्तरदाताओं से प्राप्त आँकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण (Correlation, ANOVA, Factor Analysis) किया गया है।
Keywords: संजा, मालवा, निमाड़, श्राद्ध पक्ष, सांस्कृतिक मूल्य, लोक परंपरा
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